रविवार, 1 फ़रवरी 2026

बोकड़िया गौत्र का प्रथम अधिवेशन


"अखिल भारतीय प्रथम बोकड़िया महाअधिवेशन"
वरकाणा अधिवेशन 2016
18 दिसंबर 2016 को कुलदेवी श्री आशापुरा माताजी के क्षेत्र में श्री वरकाणा पार्श्वनाथ तीर्थ, वरकाणा के धर्मस्थान में पूर्ण उमंग एवं उत्साह के साथ आयोजित हुआ। 21 सदस्यी आयोजन समिति के कर्मठ और क्रियाशील नेतृत्व में अखिल भारतीय प्रथम बोकड़िया महाअधिवेशन पूर्ण सफलता के साथ संपन्न हुआ। राष्ट्रीय संयोजक श्री हंसराज बोकड़िया (सांचौर) ने जयघोष के साथ अधिवेशन सभा के *प्रथम सत्र* का मंगलमय प्रारम्भ किया। श्री मनीष बोकाड़िया (बदनावर) ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। 11 नवकार के ध्यान से शुभारंभ अधिवेशन में सर्वप्रथम पधारे हुए सभी सगौत्रीय बंधुओं का भावभीना स्वागत किया गया। श्री सुशीलकुमार बोकड़िया (अमरावती) ने गत *बरोडा प्रतिनिधि सभा* की कारवाही (मिनिट्स) का पठन किया। राष्ट्रीय संयोजक श्री हंसराज बोकड़िया ने सभा संचालन करते हुए गौत्रीय संगठन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। "संघ गुणायरं वंदे" गुणों का आगार संघ वंदन तुल्य होता है। इस सूत्र के साथ संगठन के उद्देश्यों को संक्षिप्त में प्रस्तुत किया। बोकड़िया गौत्र के बारे में जानकारी देते हुए संचालक महोदय ने बोकड़िया गोत्र के इतिहास संकलन, शोध, संशोधन एवं संपादन के कार्य को संक्षेप में प्रस्तुत किया। साथ ही बोकड़िया गोत्र के अब तक शोधित संकलित संपादित इतिहास को सभा के सम्मुख सारसंक्षेप में पढ़कर सुनाया। तद्पश्चात 'मिलन-परिचय' का प्रारम्भ किया गया। सभी बंधुओं ने सभा के मंच से अपना अपना परिचय प्रस्तुत किया। इसप्रकार सभी के परिचय का आदान प्रदान सम्पन्न हुआ। सभा के पश्च्यात श्री आशापुरा माताजी, नाडोल दर्शनार्थ जाने की योजना थी अतः सभी सभासदों को 11 बजे माताजी दर्शनार्थ जाने की सविनय सूचना दी गई। सभा को अगले सत्र के लिए दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित किया गया। *नाडोल दर्शन* दोपहर 11.00 बजे श्री आशापुरा माताजी दर्शन महाभोग का कार्यक्रम था। पूर्व संध्या में ही समस्त बोकड़िया परिवार की तरफ से माताजी की पडाई स्वरूप, पूरा वेश एवं श्रृंगार अर्पण किया गया था ताकि दर्शन के समय माताजी उसी वेश में दर्शन दे। सभा के पश्चात वाहनों द्वारा सभी बोकड़िया बंधु नाडोल माताजी पहुँचे। वहां समस्त बोकड़िया परिवार द्वारा सामूहिक ५.२५ किलो लापसी का भोग लगाया गया। सभी बोकड़िया भक्तों ने दर्शन सेवा पूजा भक्ति की एवं कुल कुटुम्ब के लिए मंगल प्रार्थना की। दर्शन भक्ति के आनंद से ओतप्रोत बंधुओं ने माताजी मंदिर में यात्रा-अर्पण किया एवं पुनः वरकाणा के लिए लौट आए। *द्वितीय सत्र......* भोजन पश्चात.....दोपहर 2.00 बजे से...... महाअधिवेशन का दूसरा और मुख्य सत्र दोपहर 2.15 मिनिट पर प्रारम्भ करने की घोषणा की गई!! सर्वप्रथम आयोजन समिति के सभी सम्माननीय सदस्यों को को मंच पर आसन के लिए आमंत्रित किया गया। पुनः जयघोष एवं 11 नवकार के ध्यान से द्वितीय सत्र का शुभारंभ किया। संयोजक श्री हंसराज बोकड़िया ने इस संगठन की भूमिका की एवं अखिलभारतीय स्तर पर बोकाड़िया परिवारों के संयोजन के दूरगामी उद्देश्यों को प्रकट करते हुए कहा कि हम करीबन 1300 वर्षों के बिछड़े मिल रहे है। ऐसे संघ का प्रधान लक्ष्य यह है कि कही कोई छोटे से गाँव में इक्का दुक्का परिवार रहता हो वह भी गर्व से कह सके कि बड़ा विशाल एवं विराट मेरा परिवार है। विशाल संगठन में प्रत्येक परिवार स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। संगठन के माध्यम से हम एक दूसरे के सहायक सहयोगी बन सकते है। भूमिका के पश्चयात संचालक महोदय हंसराज जी ने आगामी सम्मेलन हेतू विचारणा के लिए चर्चा सूत्र की शरुआत की। इस चर्चा में अनेक मुद्दे विचारणीय थे.. सम्मेलनों की अवधि क्या हो, कहाँ बुलाया जाय, कैसे...आदि, केवल पुरुष वर्ग, सजोड़े अथवा सपरिवार। कब बुलाया जाय व अर्थप्रबंध कैसे हो। इस चर्चा में सभी बंधुओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। कई सुन्दर सुझाव एवं महत्वपूर्ण प्रस्ताव आए। सार्थक चर्चा के अंत में सभी की एक राय बनी जिसे संचालक हंसराज जी ने सभा समक्ष स्पष्ट किया। 1. सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित हो!! 2. अगला सम्मलेन सजोड़े (couple)हो!! 3. अगले सम्मेलन में तीर्थ एवं आमोद प्रमोद दोनों पर विचार हो!! 4. सम्मेलन 2 दिवस एक रात्री का रहे!! 5. व्यय प्रस्तावों एवं अर्थ प्रबंध पर समिति में विचारणा हो। 6. स्थान समय व योजना पर समिति निर्णय करेगी!! एजेंडा में अगला बिंदु आयोजन समिति का पुनर्गठन था। इस बिंदु पर भी सार्थक चर्चा हुई। सदन से समिति के आमूल चूल परिवर्तन का आदेश नहीं हुआ। सभी की एक राय थी कि वर्त्तमान 21 सदस्यों की समिति कार्यरत रहे। जब आग्रह किया गया कि कई नए क्षेत्र ग्राम नगर को समिति में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। ऐसे में सदन ने समिति विस्तार की अनुशंसा की एवं 10 नए सदस्यों को लेकर 31 की विस्तारित कमिटी का निर्णय हुआ। सभा से ही 10 नामों को आमंत्रित कर 31 की कमिटी का निर्णय हुआ। अगला एजेंडा डायरेक्ट्री संबंधी विमर्श था। बिना संपर्कों के सभी तक पहुँचना आसान नहीं, डायरेक्ट्री की त्वरित आवश्यकता सभी ने महसूस की।उस पर उचित चर्चा के बाद फॉर्म कलेक्शन में तेजी लाने का निर्णय हुआ। फॉर्म संकलन की अंतिम तिथि 30 जून निर्धारित की गई। इस कार्य में सभी से सहयोग की अपील की गई। अगला मुद्दा क्षेत्र प्रतिनिधि दल का विस्तार था। किंतु सभा में नए क्षेत्र वासी की अनुपस्थिति के परिणाम स्वरूप कोई नए नाम नहीं आए। समिति संपर्क अनुसार नए प्रतिनिधियों को जोड़ेगी। अगला बिंदु आय व्यय के ब्यौरे का प्रस्तुतीकरण था। श्री दिनेश जी बोकड़िया (मंडार) ने आय व्यय का ब्यौरा पेश किया। अगला एजेंडा बिंदु संगठन की विजनरी था। संयोजक श्री हंसराज जी ने संक्षेप में भविष्य में संस्था के लिए करने योग्य योजनाओं का उल्लेख किया। आठवा बिंदु था अन्य विषय संचालक की अनुमति से..... अन्य विषय में श्री सुशीलजी अमरावती की संकल्पना से जारी अधिवेशन की स्मृति स्वरूप जारी पोस्टल कवर का विमोचन किया गया। विमोचन पधारे हुए बंधुओं में बुजर्ग सदस्यों के कर कमलों से सम्पन्न हुआ एवं साथ ही शब्द सुमन द्वारा बुजर्गों का सम्मान किया गया। एक अन्य लिखित प्रस्ताव उदयपुर की महिला मंडल से प्राप्त हुआ जिसमें बोकड़िया समाज का अखिलभारतीय स्तर पर महिला मंडल रचने का प्रस्ताव आया। एक प्रस्ताव श्री पुखराज जी बोकड़िया ने प्रस्तुत किया था हमें सगौत्रीय बंधू सहायता की योजना बनानी चाहिए इस प्रस्ताव को अन्य विषय में सम्मलित किया गया। एक अन्य प्रस्ताव बलदोटा गोत्र तक संगठन को विस्तार देने का आया। इन सभी प्रस्तावों पर विचार करने का समिति ने पूर्ण विश्वास दिलाया। संयोजक श्री हंसराज जी ने सभी बंधुओं, सहायकों सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। पूरी परियोजना को उसके लक्ष्य तक पहूँचाने में सहयोगी समिति सदस्य एवं साथ सहकार के लिए सभी के प्रति व्यक्तिगत आभार प्रस्तुत किया।

बोकड़िया और बलदोटा एक ही गोत्र


बोकड़िया गोत्र में यह जानकारी पहले से ही थी कि बोकड़िया और बलदोटा एक ही गोत्र है। कई बोकड़िया बंधुओं से मिलना हुआ तो उन्होने भी इस बात को स्वीकार किया कि बोकड़िया बलदौटा एक ही गोत्र के दो नाम है, जब बलदोटा बंधुओं से मिलना हुआ तो उन्होने भी वही बात दोहराई कि बोकड़िया बलदोटा भाई-भाई है, अर्थात् एक ही गोत्र के दो नाम है।

बोकड़िया गोत्र के इतिहास की खोज के समय जब बोकड़िया गोत्र का नामोल्लेख से अधिक कोई कोई उल्लेख ओसवाल इतिहास ग्रंथो में नहीं मिला तो एक प्रारम्भिक सूत्र के थामने के उद्देश्य से बलदोटा गौत्र के इतिहास की खोज की गई। और बलदोटा गौत्र का एक संक्षिप्त इतिहास, श्री सुखसम्पतराज भंड़ारी लिखित "ओसवाल जाति का इतिहास" नामक वृहद ग्रंथ में मिल गया। उल्लेख इस प्रकार था……

"ऐसी किम्बदंति है कि संवत् 709 में रामसीन नामक नगर में श्री प्रद्योतनसूरि महाराज मे चाहड़देव को जैन धर्म का उपदेश देकर श्रावक बनाया। चाहड़देव के पुत्र बालतदेव से 'बलदोटा' गौत्र की स्थापना हुई। इन्होने अपने नाम से 'बलदोटा' नामक एक गाँव आबाद किया।"

हालांकि इसमें बोकड़िया शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था किन्तु एक "गाँव बसाने" के उल्लेख ने रोमांचित कर दिया। साथ ही कुछ सूत्र तो मिले ही जिस आधार पर खोज का मार्ग प्रारम्भ होता है। 'रामसीन', 'प्रद्योतनसूरि',  'चाहड़देव', 'बालतदेव', 'बलदोटा गाँव' आदि। रामसीन नगर के इतिहास के बारे तो कुछ खास नहीं मिला, हां रामसीन कस्बे का अस्तित्व मिल गया, प्रद्योतनसूरि का काल संवत 709 से मेल नहीं खा रहा था। चाहड़देव व बालतदेव का नाम किसी राजवंश में नजर नहीं आ रहा था। अन्ततः बलदोटा गांव की खोज प्रारम्भ की गई। मानचित्र में रामसीन के आस पास नजर दौड़ाने पर नजर "बरलूट" नामक एक गांव पर ठहरी। बरलूट जाकर खोज करने पर पाया कि हां इस गांव का प्राचीन नाम "बलदोट" ही था। ग्रामवासियों से पूछने पर उन्होने प्राचीन पार्श्वनाथ मन्दिर में एक  शिलालेख होने की बात कही, और कहा, कि इस शिलालेख में बलदउट का स्पष्ट उल्लेख है। यह शिलालेख मन्दिर के पुनर्निर्माण के समय तल की गहराई से प्राप्त हुआ था। उत्सुकता से उस शिलालेख को देखा गया तो बात सही निकली…

संवत 1283 का यह शिलालेख जालोर सोनगरा चौहान शासक उदयसिंह के समय का था। यह मन्दिर जिसका नाम 'मनणसिंह विहार' था जो मनणसिंह के श्रेयार्थ, वृहदगच्छ के वादिवेवाचार्य संताने श्री धनेश्वर सूरि के शिष्य गुण……सिंहसूरि के हाथों प्रतिष्ठित था। इसमें स्पष्ट इस नगर का नाम "बलदउट" उल्लेखित था।

अर्थात् बलदोटा गोत्र के इतिहास में वर्णित बलदोट गांव बसाने का तथ्य यथार्थ था और विद्यमान भी। गोत्र का इतिहास सत्य के करीब होने का यह मजबूत साक्ष्य था।

उसी दौरान हमारी कुलगुरुओं की खोज भी सफल हुई और हमें हमारी वंशावली की प्रतिलिपि उपलब्ध होने के सुखद समाचार मिले, पुरानी लिपी पढ़ने वाले के सहयोग से उस वंशावली के प्रारम्भीक अंश का उतारा लिया गया। और हमारे आश्यचर्य का ठिकाना न रहा कि इस वंशावली का शीर्षक ही "बोकड़िया-बलदोटा" था। और इतिहास में वर्णित बलदोट गाँव बसाने की वही घटना उल्लेखित थी।

यह प्रबल साक्ष्य था यह निर्णय करने में कि "बोकडिया और बलदोटा" एक ही गोत्र है।

- हंसराज बोकड़िया


बोकड़िया – बलदोटा

बोकड़िया – बलदोटा
॥श्री गणेशाय नमः॥
ॐ बोकड़िया गौत्र, बलदोटा गौत्रे, पूर्ववंशे चवांणवंशी राजपूत, महाराज श्री पृथ्वीपाल जी रे पाट वासदेव, वासदेव रे पाट सोमदेव, सोमदेव रे पाट सामंतसिंह, रामसीण वास्तव्य॥

संवत 707 वरषे, रामसीण नगरे, राजा सामंतसिंह राज करे छे। तण रे पुत्र नहीं, अनेक प्रकार का दान उपाय कीधा, पुत्र री प्राप्ति हुई नहीं। एक वार राजा हेड़े हालिया शिकार खेले छे, घणा जीवां ने मारिया तरे आगा हालिया। आगे देखे तो धरमाचारज गुरू तपस्या करे छे। राजा गुरू ने देखने पगे लागो। स्तुति किदी, “अहो! महाराज म्हारे माथे हाथ धर दो!” तरे गुरू बोळ्या, "हे राजा! जैन धर्म धारण कर, सात व्यसन रा त्याग कर!! सात व्यसन किस्या?……"
"द्युत च मांस च सुरा च वेश्या, पापार्धिचौर्ये पर-दार सेवा।
एतानि सप्त व्यसनानि लोके, घोरातिघोरं नरकं नयन्ति॥"
जद राजा गुरां रा वचन थी सात व्यसन रो त्याग किधो। सिवधर्म छोड्यो, जैन धर्म री साधना आराधिता। रात्री भोजन निवार्यो, मद-मांस छोड्यो, घोडा हाथी ने छाण्यो पाणी पावण लागा। राजा श्रावग रो धरम आदरियो, भट्टारक सिरि वर्धमानसूरि प्रतिबोध दंता। पश्चात रामसीण ग्राम मध्ये श्री भगवंत रो देवरो करायो, संवत 709 वरसे। तीण अवसरे सोनेरी सूत्र वेरायो, चेला चार लेने वेराया।
ओसवाल, गौत्रजा 'आछोपला' थापी।
दीपमाला पूरसे, आखातीज दसरावे नव-नैवध कीजै। पूत्र जनमिये सांकली मासा सवा चढाविजै। चवदस अष्टमी दने तेह कीजै, अरटियो नहीं फरे। वाजणी सांकली न पेरणी।
खेतलो, 'मंडोवर रो क्षेत्रपाल ' पूजणो।
तेल सेर 5, कणेर फूल। लापसी करणी, पुत्र जनमिया कीजै, विवाह में अधकर कीजै। सोनाणा रो खेतलो पूजीजै, वड़ा बेटा रो नाक बिंदिजै, जीवतो रहे।
राजा सामंतसिंह रे पाट, श्रीपाल के जगलुगढ प्रसाद करायो। रूपिया लख 92 खर्च्या। सत्रुकार दीधो, वरस दोय रे सकाने। सोनैया रा नेमत दीधा। प्रतिष्ठा श्री गुरू देवानन्दसूरि।
श्रीपाल रे पुत्र पीपल, पुत्र रावण, पहीड़। रावण रे पुत्र अमधर रे पुत्र पदमसिंह पुत्र विक्रमसिंह पुत्र उदैसिंह पुत्र अमेदसिंह।
रामसेणनगर रे उपर पादशाह 12 आया। बारेई पादशाहो ने जीत्या, तद पादशा वीरद दीधो, “बड़ा बलवान छे” तग श्री बलदोटा गौत्रे  सं 1011 वेशाख सुदी 15 दिने बलदोट नगर वसायो।
पहाड़ जी, बोकड़िया-बलदोटा गौत्रे :-
पहाड़ जी के मंडोवर मध्ये कुंथनाथ प्रसाद कराया। बावन जिनालो देवरो, सं 1095 वरषे, वैसाख सुदी 15 दिने, सोमवार स्वाते नक्षत्रे, प्रतिष्ठा भट्टारक श्री दीवानन्दसूरि जी।
श्रेष्ठ पहाड़ पुत्र देवधर ने बोकड़िया विरुद दीधो :-
पादशाह चढ़ने आयो, मुळक में तुरकाणी कीधी। जद देवधर जी खेतलाजी सुं अरज कीधी। माताजी रा देवरा खड़क कीधा। पादशाह रो नाम अमलदीन सुलतान। जद देवमाया हुई, पादशाह हारे। पुत्र शहजादा री गाबड़ अपूठ फरे गई। जद पादशाह जाण्यो, ए देव साचो छे, देवरो पाडो मती। फेर कह्यो, जो साहेजादा री गाबड़ सुधी करे तीण ने मांगे सो देउं। जदी हकेकत सुणी राजाकरवाणी करे दीधी। अनेक प्रकार रा जंत्र मंत्र कीधा, पण साता हुई नहीं। जोगणी सळियो छे। चोरासी जीवजूण भरिया छे, सवा लाख बोकड़ा, सवा लाख कूकड़ा, फेरियां बे भैस चढ़ावसी।
आ वात देवधर जी जाण्यो, ए जीव सरव परा मरसी। पादशाह सुं मालूम कराई। जद पातशाह पालखी मेली। देवधरजी गया, पातशाह सुं राम-राम कीधो, पातशाह उभो वे ने ताज़ीम दीधी ने कह्यो, “आप मांगोगा सो देउं” जद देवधरजी पातशाह रो वचन मांग्यो, तद पातशाह वचन दीधो। जद कंवर ने साजो कीधो। पातशाह ने कहयो, “थारो वचन संभालो”। पातशाह कह्यो, “सो मांग”। तिण समै फौज मेली, बंधीवान छोड़ाया। सरव जीव बोकड़ा जणा रे कडी लगाई, कूकड़ा ने परा छोड्या। वळी पादशाह लाख पसाव दीधो। तीण समै, बोकड़िया विरूद पाया। पातशाह टूटा थका भगवंत रा देवरा कराया। सोना-चांदी रा बंब भराया। आ संवत 1123 रा वरषे, प्रतिपाल राखी।
वळी कुंथनाथ भगवान तुस्टमान हुआ। श्रेष्ठ देवधर जी पुत्र अगड़, मंडोवर नगरे सदाव्रत दीधी। वरसे 25 रा काने, रसोई दीधी, सोना आदि।
पुत्र धणदेव, पुत्र नरसिंग, पुत्र वरसिंग, पुत्र नापा। वरसिंग पुत्र गोसल, पुत्र असधर, पुत्र जसदेव, पुत्र चउदेव, बोड़ा 3 आसु। जसदेव जेहलू, समधर,गजधर, वजैसिंग। जेहलू पुत्र राजू, चाहल, पुत्र लाला पुत्र लींबा, घीघा, कीका, उसतकुमार्। लींबा रो पुत्र कुरसी, लखमा, पदमसिंग, पुण्यपाल, वस्ता, पुत्र राणा, हेमा। 
रणसिंह हुंकार दीधी।
श्री इ्न्द्रमाल :

आबू रो संग काड्यो, तिहां बावन संग में आप रो संग सरे। आपरो संग त्यां थी शत्रुंजय गया, तीहां मोहर 12000 खरची, इन्द्रमाल पहेरी। आबूजी में मोहर 13000 खरची। गीरनार जी में संगमाल पहेरी, तिहां मोहर 11000 लगाई। रखबदेव जी मोहर 8000 खरची, संघमाल पेहरी। आबू विमल गढ़ जस लियो। गढ़ गिरनार बावन संग में जस लियो। संघवी पदमी पाई।
भट्टारक श्री देवानन्दसूरि जी, मोतियां री माल, सोना रा सूत्र, चेला 8, पालखी, चमर, छत्र दीधा। दुशाला ओढ़ाया, मनसा भोजन दीधा, दवा आशीष लीधी।
रणजीतसिंह रे भार्या कुंतादे : बारे व्रत धारिया, श्रावग ना व्रत पछखाण लीदा। वीस स्थानक तप आराधिया। ते पछे, छ-एक बिंब भराया। अग्यारे सूत्र सोना रा वेराया। साधां ने अनेक प्रकार का धरम ध्यान कीदा। महाजन रो खटकर्म साध्यो, उजमणो कीधो। गांव मंडोवर मध्ये, दाम हजार 80 खरच्या। हेमाजी ने कालो खेतलो मंडोवर तुष्टमान हुआ। 
॥इति॥

(प्राप्त वंशावली की प्रतिलिपि का  प्रथम पृष्ठ)

मूल वंशावली : कुलगुरु श्री धनरूप जी, ‘वड़गच्छ पोशाल’, ‘जोजावर’। संवत् 1924 असाढ वदी 3, दिखण देश में जुने परगने ‘बोरी-चिचोरी’

संपादन एवं  प्रस्तुतिकरण  -  हंसराज बोकड़िया

बोकड़िया गौत्र का इतिहास

बोकड़िया-बलदोटा
संवत् 707 में रामसीण नगर पर चौहान वंशीय राजा सामंतसिंह राज्य करते थे। एकदा अरण्य में आखेट क्रिड़ा के समय सामंतसिंह की भेंट एक जैनाचार्य से हुई। शिकार जैसी हिंसक प्रवृति को दुर्व्यसन बताते हुए, जैनाचार्य श्री जयदेवसूरि ने राजा को शिकार आदि सात व्यसन के त्याग की प्रेरणा दी।
आचार्यवर जयदेवसूरि ने स्पष्ट करते हुए कहा,
“द्युत च मांस च सुरा च वेश्या, पापार्धिचौर्ये पर-दार सेवा।
एतानि सप्त व्यसनानि लोके, घोरातिघोरं नरकं नयन्ति॥“
राजा सामंतसिंह ने जीवदया का प्रतिबोध पाकर, जैन धर्म अपनाया एवं श्रावकोचित व्रत-नियम ग्रहण किए।
सामंतसिंह के दो पुत्र थे, श्रीपाल एव चाहड़देव। इन्होने संवत् 709 में भगवान महावीर का “जांगलगढ़” नामक जिनप्रासाद बनवाया। प्रतिष्ठा भट्टरक श्री देवानन्द्सूरि ने सम्पन्न की।
आगे चलकर इस वंश के बलिष्ट यौद्धाओं ने रामसीण पर हुए आक्रमण का बलपूर्वक प्रतिरोध किया एवं उन्हे पराजित किया। परिणाम स्वरूप इन्हे साक्षात बलदेव की उपाधि मिली। इनकी संतति को “बलदोटा” विरुद प्राप्त हुआ। संवत् 1011 में इन्होने "बलदोट" नामक एक नगर बसाया।
आगे चलकर श्रीपाल के वंशज मण्डोर आ बसे। यहाँ श्री पहाड़ जी बलदौटा ने, संवत 1095 में श्री कुंथुनाथ भगवान का बावन जिनालय मन्दिर बनवाया। सम्भवतः आचार्य वर्धमानसूरि ने प्रतिष्ठा सम्पन्न की।
संवत् 1123 में मण्डोर पर किसी सुलतान का भीषण आक्रमण हुआ। उसने मण्डोर को तहस नहस कर कब्जा कर लिया। वहां प्रतिदिन चार हजार बकरों का वध किया जाता था। उस समय श्रेष्ठ पहाड़ जी के पुत्र देवधर जी बड़े साहसी पुरुष थे। जीवों की हिंसा देखकर उनका हृदय अनुकम्पा से द्रवित हो उठा। उन्होने सुलतान से मिलकर उसे समझाने की ठानी। सुलतान को युक्तियुक्त समाधान देकर, हजारों बकरों को अभयदान दिलवाया। इस जीवदया-प्रतिपाल के परिणाम स्वरूप, संवत् 1123 में  देवधर जी को “बोकड़िया” विरुद प्राप्त हुआ। इस तरह श्री देवधर जी बलदोटा से बोकड़िया गौत्र की स्थापना हुई।

-  हंसराज बोकड़िया

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

घटना निर्णय

1 रामसीण पर आक्रमण एवं बलदोटा उपाधि
2 बलदोट नगर स्थापना, बरलूट सं १०१०
3 मंडोर पर आक्रमण
4 मन्दिरों की प्रतिष्ठाएं
5 संघयात्राओं के वर्णन

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

ओसवाल इतिहास ग्रंथों की सूची

ओसवाल जाति के इतिहास ग्रंथों में


1- "जैन सम्प्रदाय शिक्षा" (संवत 1967) ले-यति श्रीपालचन्द्र
2- "महाजन वंश मुक्तावली" (संवत 1967) ले- यति रामलाल
3- "श्री जैन गोत्र संग्रह" ( संवत 1980) ले- पं हीरालाल हंसराज
4- "औसवाल जाति का इतिहास" ( संवत 1982) श्री सुखसम्पतराय भंड़ारी
5- "श्री जैन जाति महोदय" ( संवत 1986) ले- मुनि ज्ञानसुन्दर
6- "भगवान पार्श्वनाथ की परम्परा का इतिहास" (संवत 2000) ले- मुनि  ज्ञानसुन्दर 
7- "ओसवाल वंश अनुसंधान के आलोक में" (संवत 2039) ले- सोहनराज भंसाली
8- "इतिहास की अमरबेल ओसवाल (संवत 2045) ले- मांगीलाल भूतोड़िया
9- "ओसवंशः उद्भव और विकास (सन् 2008) ले- डॉ महावीरमल लोढ़ा
10- "ओसवंश का इतिहास" (सन् 2008) ले- डॉ महावीरमल लोढ़ा

शनिवार, 18 नवंबर 2017

बोकड़िया गच्छ का अस्तित्व

प्राचीन इतिहास साहित्य के अध्ययन के दौरान हमें एक गौरवशाली तथ्य मिला। बोकड़िया समुदाय के लिए, कभी स्वतंत्र "बोकड़ियागच्छ" विद्यमान था। ऐसा अमूमन किसी गोत्र का गच्छ नहीं देखा गया। शिलालेख एवं प्रतिमा लेख के ग्रंथों का अध्ययन इस आशय से हो रहा था कि शिलालेखों के साक्ष्य से बोकड़िया गोत्र का इतिहास, गोत्र के विशिष्ट पुरुषों के बारे में जानकारी हासिल हो। उसी उपक्रम में बोकड़िया गच्छ का अस्तित्व सामने आया। उल्लेख देखने से हमें साधुओं के नाम, उनका काल एवं उत्तरोत्तर गच्छ के नाम परिवर्तन की भी जानकारी प्राप्त होती है। उक्त शिलालेखों को क्रमबद्ध करने से यह साक्ष्य भी मिलता है कि 'बोकड़िया गच्छ', प्राचीन वड़गच्छ (वृहदगच्छ) की शाखा था। सम्भवतः यह चंद्रकुल से वनवासीगच्छ एवं उसके पश्चात वड़गच्छ नाम से विख्यात हुआ वड़गच्छ से रामसैन्य गच्छ एवं रामसैन्यगच्छ से बोकड़िया गच्छ शाखा निकली। वड़गच्छ ही तपागच्छ आदि का पूर्व गच्छ था।
शिलालेख :
सं 1458 श्री धनदेवसूरि पट्टे धर्मदेवसूरि 'रामसेनिया गच्छे'
सं 1496 श्री भट्टा. धर्मतिलकसूरि 'बोकड़िया गच्छे'
सं 1503 श्री भट्टा. धर्मचंद्रसूरि 'रामसेनिया गच्छे'
सं 1511 श्री भट्टा. मलयचंद्रसूरि 'रामसेनिया गच्छे'
सं 1519 श्री धर्मचन्द्रसूरि पट्टे मलयचंद्रसूरि 'वृहदगच्छे बोकड़िया वंटके'
सं 1525 श्री धर्मचन्द्रसूरि पट्टे मलयचंद्रसूरि 'वृहदगच्छे बोकड़िया वंटके'
सं 1529 श्री मलयचंद्रसूरि 'गच्छे बोकड़िया'
सं 1529 श्री मलयचंद्रसूरि 'बोकड़िया'
सं 1530 श्री मलयचंद्रसूरि 'वृहदगच्छे बोकड़िया वंटके'
सं 1549 श्री मलयचंद्रसूरि पट्टे मणीचंद्रसूरि
सं 1553 श्री भट्टा. मुनिचन्द्रसूरि 'वृहदगच्छे बोकड़िया वंटके'
सं 1559 श्री मलयचंद्रसूरि पट्टे मणीचंद्रसूरि 'वृहदगच्छे बोकड़िया वंटके'
सं 1562 श्री मलयचंद्रसूरि पट्टे मणीचंद्रसूरि  'बोकड़िया गच्छे'
सं 1587 श्री मलयहंससूरि 'वृहद बोकड़िया गच्छे'
सं 1617 श्री देवानंदसूरि 'बोकड़िया गच्छे'
इस प्रकार वृहदगच्छ (वडगच्छ) की शाखा रामसेनियागच्छ और रामसेनिया गच्छ से बोकड़ियागच्छ शाखा निकली। रामसीन से तो हमारा संबंध है ही साथ ही दो शिलालेख में तो "वृहदगच्छे बोकड़िया वंट" स्पष्ट उल्लेख है। अर्थात बोकड़िया गच्छ, वडगच्छ की शाखा है। यह स्पष्ट संकेत है कि हमारा मूल गच्छ, वड़गच्छ (वृहदगच्छ) है।
'प्राचीन लेख संग्रह' ले. विद्याविजय जी (प्र. सं. १९२९) लेखांक : ४०२
'जैन प्रतिमा लेख संग्रह' ले. बुद्धिसागर, लेखांक : ४३२

'प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : ३१५
नागोर बड़ा मन्दिर

'प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : ७१४
जयपुर पंचायती मन्दिर

'प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : ७१६
जयपुर पंचायती मन्दिर

'प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : ७२५
पनवाड़ महावीर मन्दिर

'जैन लेख संग्रह' ले. पूर्णचन्द्र नाहर, लेखांक : १९१५

जैन लेख संग्रह' ले. पूर्णचन्द्र नाहर, लेखांक : १२४६
प्राचीन चौरासी गच्छ की सूची में 13 वे स्थान पर "बोकड़िया गच्छ"



एक अन्य प्राचीन 84गच्छ सूची में 20 वे स्थान पर बोकड़िया गच्छ।

जैन लेख संग्रह' ले. पूर्णचन्द्र नाहर, लेखांक : ११६९
प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : १८२
नागौर बड़ा मन्दिर



मध्यकालीन राजस्थान में जैन धर्म नामक शोध प्रबंध में उल्लेख

जैन लेख संग्रह' ले. पूर्णचन्द्र नाहर, लेखांक : १४१४

'प्रतिष्ठा लेख संग्रह' ले. उपाध्याय विनयसागर लेखांक : ९१६
जयपुर पंचायती मन्दिर